इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) का शोर हर तरफ है। टीवी से लेकर सोशल मीडिया तक, बस चौकों-छक्कों की बातें हो रही हैं। यह क्रिकेट का एक शानदार जश्न है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन इस चकाचौंध के पीछे एक स्याह सच भी छिपा है — भारत के दूसरे खेलों का संघर्ष। जब सारा ध्यान, पैसा और मीडिया कवरेज क्रिकेट पर सिमट जाता है, तो बैडमिंटन, एथलेटिक्स, और तैराकी जैसे खेलों के एथलीट गुमनामी और संसाधनों की कमी से जूझते रह जाते हैं। यह कहानी सिर्फ IPL की सफलता की नहीं, बल्कि भारत में गैर-क्रिकेट खेलों की भयानक दुर्दशा की भी है। सच यही है।

मुख्य बातें
  • IPL की वजह से मीडिया में गैर-क्रिकेट खेलों को लगभग कोई कवरेज नहीं मिलती, जिससे उनकी लोकप्रियता घट जाती है।
  • अधिकांश कॉर्पोरेट स्पॉन्सरशिप क्रिकेट में चली जाती है, जिससे दूसरे खेलों के लिए फंडिंग का संकट खड़ा हो गया है।
  • बैडमिंटन, एथलेटिक्स और तैराकी जैसे खेलों के एथलीटों को अक्सर बुनियादी सुविधाओं और ट्रेनिंग के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है।
  • कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी पहचान और वित्तीय सहायता न मिलने के कारण अपना करियर बीच में ही छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।
  • एक सच्चा 'खेल राष्ट्र' बनने के लिए सभी खेलों को समान महत्व और समर्थन देना बेहद ज़रूरी है, जो अभी नहीं हो रहा है।
  • सरकारी नीतियां तो हैं, लेकिन उनका फायदा ज़मीनी स्तर पर असली एथलीटों तक नहीं पहुँच पा रहा है।

IPL की चमक और बाकी खेलों का अंधेरा

सोचो ज़रा। IPL के दो महीनों में हज़ारों करोड़ रुपये का कारोबार होता है। हर खिलाड़ी पर करोड़ों की बोली लगती है, विज्ञापन की दुनिया में तूफ़ान आ जाता है और मीडिया 24/7 सिर्फ़ इसी की कवरेज करता है। यह एक विशाल मनोरंजन उद्योग बन चुका है। लेकिन इस चमक के दूसरी तरफ़, एक एथलीट है जो शायद अगले नेशनल टूर्नामेंट में जाने के लिए पैसों का इंतज़ाम कर रहा है। या एक तैराक, जिसे एक अच्छे स्विमिंग पूल में प्रैक्टिस करने का मौका तक नहीं मिल रहा। और जब सारा कॉर्पोरेट बजट और मीडिया का एयरटाइम IPL खरीद लेता है, तो इन खिलाड़ियों के लिए कुछ नहीं बचता। उनकी जीत की खबरें अखबार के किसी छोटे कोने में दबकर रह जाती हैं। यह एक ऐसा असंतुलन है जो भारतीय खेल के भविष्य के लिए खतरनाक है।

ज़मीन पर संघर्ष: एथलीटों की अनसुनी कहानी

यह सिर्फ़ फंडिंग या मीडिया कवरेज की बात नहीं है, यह सम्मान और पहचान की भी लड़ाई है। जब एक युवा क्रिकेटर को बचपन से ही हीरो की तरह देखा जाता है, तो वहीं एक धावक या बैडमिंटन खिलाड़ी को अपना करियर बनाने के लिए समाज और परिवार से लड़ना पड़ता है। उन्हें यह साबित करना पड़ता है कि उनके खेल में भी भविष्य है। कई एथलीट बताते हैं कि कैसे उन्हें अच्छी ट्रेनिंग, पोषण और मनोवैज्ञानिक समर्थन के लिए खुद ही जुगाड़ करना पड़ता है। सरकार की 'Khelo India' जैसी स्कीमें अच्छी हैं, पर उनका लाभ सही एथलीट तक पहुंचने में सालों लग जाते हैं। तो नतीजा यह होता है कि कई होनहार प्रतिभाएं सिस्टम की खामियों और अनदेखी के कारण दम तोड़ देती हैं। यह हमारे देश का टैलेंट है जो बर्बाद हो रहा है।

क्या हम सिर्फ एक-खेल वाले देश बनकर रह जाएँगे?

यह एक ज़रूरी सवाल है जो हमें खुद से पूछना चाहिए। क्या हम अपनी पहचान सिर्फ एक क्रिकेट खेलने वाले देश के रूप में बनाना चाहते हैं? अगर हमें वाकई एक 'Sporting Nation' बनना है, तो हमें अपनी सोच बदलनी होगी। इसकी शुरुआत कई स्तरों पर करनी होगी। कॉर्पोरेट घरानों को क्रिकेट से बाहर निकलकर दूसरे खेलों में भी निवेश करना होगा — यह उनकी सामाजिक ज़िम्मेदारी भी है। मीडिया को भी अपनी भूमिका समझनी होगी और सभी खेलों को बराबर मंच देना होगा। और सबसे ज़रूरी, हम दर्शकों को भी क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों को देखना और उन्हें सपोर्ट करना होगा। जब हम हॉकी के मैच के लिए स्टेडियम भरेंगे और एथलेटिक्स मीट को टीवी पर देखेंगे, तो बदलाव अपने आप आएगा। क्योंकि असली ताकत तो जनता के हाथ में ही होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या IPL भारतीय खेल के लिए बुरा है?

देखिए, IPL अपने आप में बुरा नहीं है। इसने क्रिकेट को एक नया मुकाम दिया है और कई खिलाड़ियों को मंच दिया है। समस्या तब होती है जब इसकी विशालता की वजह से बाकी सभी खेल पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिए जाते हैं और सारा resource सिर्फ एक ही जगह लग जाता है।

सरकार दूसरे खेलों के लिए कुछ क्यों नहीं करती?

सीधी बात ये है कि सरकार की तरफ से स्कीमें तो हैं, लेकिन उनका implementation ज़मीनी स्तर पर बहुत धीमा और जटिल है। असली खिलाड़ियों तक मदद पहुंचने में bureaucracy और पारदर्शिता की कमी जैसी कई रुकावटें हैं। सिर्फ policy बनाना ही काफी नहीं होता।

आम लोग इसमें क्या भूमिका निभा सकते हैं?

देखिए, बदलाव हमेशा जनता से ही शुरू होता है। जब हम क्रिकेट के अलावा बैडमिंटन, हॉकी, या एथलेटिक्स जैसे मैच भी देखेंगे और social media पर उनके बारे में बात करेंगे, तो media और sponsors पर अपने आप दबाव बनेगा। हमारी दिलचस्पी ही इन खेलों का भविष्य तय करेगी।