अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump और चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping के बीच Beijing में हुई दो दिवसीय हाई-प्रोफाइल मुलाकात खत्म हो गई है। दोनों नेताओं ने इस बातचीत को "बहुत सफल" और "यादगार" बताया, लेकिन इस पूरी कवायद के बाद किसी बड़ी trade deal की घोषणा नहीं हुई। भव्य स्वागत और औपचारिक समारोहों के बीच, दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापारिक तनाव पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका।

इस दौरे पर सबकी नज़रें टिकी थीं। Trump अपने साथ agriculture, aviation और energy जैसे क्षेत्रों से जुड़े बड़े अमेरिकी कारोबारियों का एक delegation भी लेकर आए थे। उम्मीद थी कि अरबों डॉलर के नए सौदे होंगे, लेकिन ऐसा कुछ भी सामने नहीं आया। हालांकि, दोनों नेताओं ने एक-दूसरे को दोस्त बताते हुए रिश्तों को मजबूत करने की बात ज़रूर दोहराई। सच यही है।

मुख्य बातें
  • US राष्ट्रपति Donald Trump और चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping की दो दिवसीय मुलाकात Beijing में संपन्न हुई।
  • दोनों नेताओं ने बातचीत को "बहुत सफल" और "अविस्मरणीय" बताया, Xi ने इसे "ऐतिहासिक" कहा।
  • तमाम सकारात्मक बयानों के बावजूद कोई बड़ी trade deal या समझौता पक्का नहीं हुआ।
  • बातचीत के मुख्य विषयों में trade, तेल, Iran और Taiwan जैसे मुद्दे शामिल थे।
  • Trump के साथ एक बड़ा अमेरिकी business delegation भी चीन गया था, लेकिन नतीजा सिफर रहा।
  • दिखावे और समारोहों पर ज़्यादा ज़ोर रहा, लेकिन ठोस व्यापारिक सफलता हाथ नहीं लगी।

हाथ मिलाए, गले मिले, पर डील का क्या हुआ?

इस मुलाकात में कूटनीति से ज़्यादा दिखावा हावी रहा। Trump के लिए शाही स्वागत का आयोजन किया गया, शानदार डिनर हुए और दोनों नेता मुस्कुराते हुए तस्वीरें खिंचवाते रहे। चीनी मीडिया के अनुसार, Trump ने इस दौरे को "विश्व प्रसिद्ध और अविस्मरणीय" बताया, जबकि Xi Jinping ने इसे "एक ऐतिहासिक और मील का पत्थर" करार दिया। इन भारी-भरकम शब्दों के बावजूद, असल सवाल जस का तस बना हुआ है — हासिल क्या हुआ?

अमेरिका और चीन के बीच अरबों डॉलर का trade deficit (व्यापार घाटा) एक बड़ा मुद्दा है। Trump इसी मुद्दे को हल करने के वादे के साथ चीन पहुंचे थे। लेकिन दो दिनों की लंबी बातचीत के बाद भी, इस मुद्दे पर कोई ठोस प्रगति नहीं दिखी। तो सवाल उठता है कि क्या यह मुलाकात सिर्फ़ अच्छे रिश्ते दिखाने और दुनिया को एक सकारात्मक संदेश देने के लिए थी?

Trade पर क्यों फंसा है पेंच?

असल में, अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक मुद्दे काफी जटिल हैं। Trump की policy 'America First' पर आधारित है, और वह चाहते हैं कि चीन अमेरिकी कंपनियों को अपने market में ज़्यादा पहुंच दे। साथ ही, वह चीन से आयात होने वाले सामान पर भारी टैक्स लगाकर व्यापार घाटे को कम करना चाहते हैं। दूसरी ओर, चीन अपनी शर्तों पर ही व्यापार करना चाहता है और अमेरिकी दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं है।

Trump का अपने साथ एक बड़ा business delegation ले जाना इस बात का संकेत था कि वह तुरंत कोई बड़ी deal चाहते थे। लेकिन चीन ने शायद इसे भविष्य की बातचीत के लिए एक शुरुआती बिंदु के तौर पर देखा, न कि अंतिम फैसले के तौर पर। और इसीलिए, मुलाकातों के बाद भी कोई बड़ी घोषणा नहीं की गई। यह एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है।

अब आगे क्या? रिश्तों का भविष्य कैसा होगा?

भले ही इस दौरे से कोई ठोस deal न निकली हो, लेकिन इसे पूरी तरह से असफल नहीं कहा जा सकता। Trump और Xi के बीच व्यक्तिगत केमिस्ट्री अच्छी दिखाई दी, जिसे भविष्य के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। दोनों नेताओं ने यह दिखाया है कि वे मतभेदों के बावजूद बातचीत के लिए तैयार हैं। यह बड़ी बात है।

अब नज़रें इस पर होंगी कि आने वाले महीनों में अधिकारी स्तर पर होने वाली बैठकों में क्या होता है। यह मुलाकात शायद भविष्य में होने वाले बड़े समझौतों की नींव रखने का एक प्रयास थी। लेकिन फिलहाल, दोनों देशों को व्यापार, तकनीक और वैश्विक प्रभाव जैसे मुद्दों पर अपने मतभेदों को सुलझाने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना है। इंतज़ार करना होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या इस मुलाकात को पूरी तरह असफल माना जाए?

देखिए, इसे पूरी तरह असफल कहना गलत होगा। भले ही कोई बड़ी trade deal नहीं हुई, लेकिन दोनों नेताओं के बीच बातचीत का सिलसिला जारी रहना ही एक सकारात्मक संकेत है। रिश्तों में जमी बर्फ पिघलाने के लिए ऐसी मुलाकातें ज़रूरी होती हैं।

बातचीत के मुख्य मुद्दे क्या थे?

सीधी बात ये है कि चर्चा कई अहम मुद्दों पर हुई। इसमें Trade असंतुलन, Iran का परमाणु कार्यक्रम, तेल supply और Taiwan का मुद्दा शामिल था। मकसद था कि हर बड़े विषय पर एक-दूसरे का नज़रिया समझा जाए और आगे की राह तय की जाए।

Trump अपने साथ किसे लेकर चीन गए थे?

देखिए, Trump अकेले नहीं गए थे। उनके साथ agriculture, aviation, और energy जैसे sectors के बड़े business leaders का एक high-profile delegation भी था। इसका मकसद चीन के साथ बड़े commercial deals फाइनल करना था, हालांकि इसमें ज़्यादा सफलता नहीं मिली।