नीट की बदहाली: सुधार का भ्रम या समाधान की कोशिश? कमेटियों के जाल में उलझा छात्रों का भविष्य
भारत में मेडिकल की पढ़ाई का सपना देखने वाले लाखों युवाओं के लिए 'नीट' (NEET) एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। लेकिन हाल के वर्षों में यह परीक्षा सिर्फ विवादों का केंद्र बनकर रह गई है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की देखरेख में आयोजित होने वाली इस परीक्षा के पेपर एक बार नहीं, बल्कि दो बार लीक हुए—पहली बार 2024 में और हाल ही में 2026 में। इन घटनाओं ने न केवल छात्रों के भरोसे को तोड़ा है, बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
एग्जाम माफिया की जड़ें और व्यवस्था की लाचारी
नीट 2024 पेपर लीक के मामले में संजीव कुमार उर्फ 'संजीव मुखिया' का नाम मुख्य संदिग्ध के रूप में उभरा। संजीव का इतिहास बताता है कि वह दशकों से परीक्षा माफिया चला रहा है। 1990 के दशक से उसका नेटवर्क सक्रिय है। उसे कई बार गिरफ्तार किया गया, लेकिन वह हर बार कानून की कमियों का फायदा उठाकर बाहर आ गया। जुलाई 2026 में उसे फिर से जमानत मिल गई। सवाल यह है कि जब मुख्य आरोपी खुलेआम घूम रहे हों, तो कड़ी सजा के वादे कितने खोखले हैं?
कमेटियों का वही पुराना ढर्रा
पेर लीक के खिलाफ छात्रों के भारी विरोध और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परीक्षा सुधारों के लिए एक 'हाई-पावर्ड टास्क फोर्स' का गठन किया। इसकी अध्यक्षता आधार के जनक नंदन नीलेकणि कर रहे हैं। हालांकि, छात्र इस नई कमेटी को लेकर संशय में हैं। इसकी वजह यह है कि 2024 में भी के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में ऐसी ही एक कमेटी बनी थी जिसने 101 सिफारिशें की थीं। सरकार ने पुरानी सिफारिशों को लागू करने के बजाय एक नई कमेटी बनाना बेहतर समझा। क्या यह सिर्फ असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का तरीका है?
तकनीकी समाधान और बुनियादी हकीकत
टास्क फोर्स का मुख्य जोर डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं पर है। लेकिन क्या हमारा देश इसके लिए तैयार है? शिक्षा मंत्रालय के अपने आंकड़े (UDISE 2024-25) बताते हैं कि 40 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में फंक्शनल कंप्यूटर नहीं हैं और 42 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट कनेक्शन नहीं है। ऐसे में परीक्षाओं को पूरी तरह डिजिटल बनाना ग्रामीण और गरीब छात्रों को दौड़ से बाहर करने जैसा होगा। यह तकनीक का समाधान कम और डिजिटल विभाजन को बढ़ाने वाला कदम ज्यादा लग रहा है।
फास्ट-ट्रैक कोर्ट: वादा बनाम हकीकत
सरकार ने पेपर लीक मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने का वादा किया है। लेकिन न्यायपालिका का बोझ कुछ और ही कहानी कहता है। पोक्सो (POCSO) एक्ट के तहत भी ऐसी ही अदालतें बनी थीं, लेकिन आज वहां 2 लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं। जब तक बुनियादी ढांचा और जजों की संख्या नहीं बढ़ेगी, केवल नाम बदलने से न्याय की रफ्तार नहीं बढ़ेगी।
कोचिंग इंडस्ट्री का बोझ और छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य
नीट जैसी परीक्षाओं ने देश में करोड़ों रुपये की कोचिंग इंडस्ट्री को बढ़ावा दिया है। छात्र आठवीं कक्षा से ही भारी दबाव में तैयारी शुरू कर देते हैं। जब पेपर लीक होता है या परीक्षा रद्द होती है, तो यह दबाव जानलेवा बन जाता है। नीट 2026 की परीक्षा रद्द होने के बाद देश में कम से कम 21 छात्रों द्वारा आत्महत्या करना इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता है। राहुल गांधी जैसे विपक्ष के नेताओं का कहना है कि हमारी परीक्षा प्रणाली को "दीमक" ने खोखला कर दिया है।
तमिलनाडु का विरोध: क्या नीट अनिवार्य होना चाहिए?
तमिलनाडु सरकार शुरू से ही नीट का विरोध कर रही है। ए.के. राजन कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, नीट ग्रामीण और कम आय वाले परिवारों के छात्रों के साथ भेदभाव करता है। यह परीक्षा केवल उन लोगों के लिए आसान है जो महंगे कोचिंग संस्थानों की फीस भर सकते हैं। राज्य का तर्क है कि मेडिकल प्रवेश के लिए बोर्ड परीक्षाओं के अंकों को आधार बनाना चाहिए ताकि सामाजिक न्याय सुनिश्चित हो सके।
निष्कर्ष
पेपर लीक की समस्या केवल कड़े कानून या नई कमेटियों से हल नहीं होगी। इसके लिए एनटीए जैसे संस्थानों में ढांचागत बदलाव और पारदर्शिता की जरूरत है। सरकार को तकनीक के साथ-साथ स्कूलों के बुनियादी ढांचे पर भी ध्यान देना होगा। छात्रों को आश्वासन नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली चाहिए। अगर हम अब भी नहीं चेते, तो सुधार के ये सारे प्रयास केवल एक "भ्रम" बनकर रह जाएंगे।




